Monday, 9 November 2026
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लाहौल घाटी में मिला औषधीय वनस्पतियों का अनमोल खजाना, चरवाहों के अनुभव से पहचाने गए 25 पौधे

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लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में सदियों से स्थानीय लोगों के पास संजोया गया पारंपरिक वनस्पति ज्ञान अब वैज्ञानिक दस्तावेज का हिस्सा बन गया है। शोधकर्ताओं ने स्थानीय चरवाहों और बुजुर्गों के सहयोग से 25 औषधीय वनस्पतियों की पहचान कर उनके पारंपरिक उपयोगों का अध्ययन किया है। इस दौरान 16 वनस्पति परिवारों से संबंधित पौधों की जानकारी जुटाई गई।
यह शोध राजीव गांधी राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल, पपरोला के द्रव्यगुण विभाग की शोधार्थी सुकृति और मोनिका मेहता ने प्रोफेसर रश्मि श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में किया। मई 2026 में लाहौल के चयनित गांवों में सर्वेक्षण कर स्थानीय लोगों से पौधों के नाम, प्राकृतिक आवास और पारंपरिक उपयोगों की जानकारी एकत्र की गई। शोध पत्र 2 नवंबर को आयुषधारा शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
पारंपरिक उपचार से लेकर खानपान तक उपयोग
सर्वेक्षण में सामने आया कि स्थानीय लोग लंबे समय से कई वनस्पतियों का पारंपरिक उपचार में इस्तेमाल करते रहे हैं। इनमें कुठ की जड़ का उपयोग पेट दर्द, खांसी और जुकाम के लिए, मनु की जड़ का इस्तेमाल खांसी व सांस संबंधी परेशानियों में तथा छोरा की जड़ का उपयोग पाचन संबंधी समस्याओं के पारंपरिक उपचार में किया जाता रहा है।
इसके अलावा अरचा के तने और पत्तियां भोजन में इस्तेमाल होती हैं। चरमा के पके फलों से गर्म पेय तैयार किया जाता है, जबकि चुकरी की पत्तियों से पारंपरिक साग बनाया जाता है।
लुप्त होते ज्ञान को सहेजने की पहल
शोधकर्ताओं ने पौधों की तस्वीरें, भौगोलिक स्थिति, उपयोगी हिस्सों और उनमें पाए जाने वाले रासायनिक तत्वों से संबंधित उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों का भी संकलन किया है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान के हस्तांतरण में कमी आने से यह विरासत धीरे-धीरे लुप्त हो सकती है।
शोध में भविष्य में घाटी का व्यापक सर्वेक्षण करने और इन वनस्पतियों के औषधीय व रासायनिक गुणों की वैज्ञानिक जांच की जरूरत भी बताई गई है। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि पारंपरिक इस्तेमाल या रासायनिक तत्वों की मौजूदगी को किसी पौधे की औषधीय प्रभावशीलता और सुरक्षा का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
खास बात यह है कि लाहौल के चरवाहों और बुजुर्गों का पीढ़ियों से संजोया अनुभव अब वैज्ञानिक शोध के जरिए सामने आया है। यह पहल हिमाचल की जैव विविधता और पारंपरिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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