दिवाली की रात मां लक्ष्मी व गणेश की पूजा का महत्व
हिमाचल प्रदेश में कई घरों में यह माना जाता है कि दिवाली की शाम मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की विशेष पूजा करने से घर में धन‑धान्य, सुख‑समृद्धि और सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। इस दिन दोनों देवताओं को साथ‑साथ स्थापित कर उनका आशीर्वाद माँगा जाता है, जिससे आर्थिक समृद्धि और कार्य‑सफलता की आशा की जाती है।
पूजा की तैयारी और समय‑निर्धारण
पूजा से पहले घर को पूरी तरह साफ‑सुथरा करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि देवी‑देवता गंदे या अव्यवस्थित घरों में प्रवेश नहीं करते। सफाई का काम दिवाली की सुबह ही पूरा कर लेना चाहिए। पूजा का मुख्य समय शाम को मुहरत के अनुसार निर्धारित किया जाता है; इस समय स्नान कर शुद्ध शरीर और मन से पूजा आरंभ की जाती है।
पूजा की विधि – चरणबद्ध विवरण
पूजा में सभी परिवार के सदस्य भाग लेते हैं, परन्तु मुख्य रूप से घर के मुखिया द्वारा अनुष्ठान किया जाता है। पहले गंगाजल से पूजा स्थल, पूजा थाली और देवताओं की प्रतिमाओं को शुद्ध किया जाता है। फिर लाल आसन पर माँ लक्ष्मी, भगवान गणेश और साथ में धन के देवता कुबेर को स्थापित किया जाता है। एक नई थाली में खील, बताशे और अन्य मिठाइयाँ रखी जाती हैं। कलश पर स्वास्तिक बनाकर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है।
इसके बाद पंचमेवा, गुड़, फूल, घी, कमल, खील व बताशे जैसी सामग्री को सभी देवताओं को अर्पित किया जाता है। माँ लक्ष्मी के वस्त्र भी उनके चरणों में रखे जाते हैं। फिर चांदी के सिक्के, गहने, बही‑खाते जैसी कीमती वस्तुएँ रखी जाती हैं। दो दीपकों में घी व तेल जलाकर अनुष्ठान पूरा किया जाता है।
पूजा के दौरान माँ लक्ष्मी के मंत्रों का जाप और श्री सूक्त का पाठ अनिवार्य है। अंत में गणेश व लक्ष्मी की आरती गाई जाती है और उन्हें मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। विशेष मंत्र “ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन‑धान्यधिपतये धन‑धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा” को 108 बार जपना माना जाता है।
पूजा समाप्ति के बाद के अनुष्ठान
पूजा समाप्त होने के बाद घर के मुख्य द्वार पर दो तेल के दीपक जलाए जाते हैं, साथ ही तिजोरी पर भी एक दीया रखा जाता है। तुलसी और शमी के पेड़ में भी दीपक जलाना अनिवार्य बताया गया है। घर के हर कोने, बाथरूम सहित, में दीपक जलाकर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित किया जाता है। यह सभी अनुष्ठान घर में समृद्धि और शांति को स्थायी बनाने के उद्देश्य से किए जाते हैं।
स्थानीय पाठकों के लिए महत्व
हिमाचल प्रदेश के कई ग्रामीण एवं शहरी परिवारों में यह प्रथा सामाजिक एवं आर्थिक आशा का प्रतीक है। दिवाली के इस अनुष्ठान से न केवल पारिवारिक एकता बढ़ती है, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों को भी इस अवसर पर पूजा सामग्री, मिठाइयाँ और सजावट की बढ़ती माँग से आर्थिक लाभ मिलता है। साथ ही, इस प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान सामाजिक सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में मदद करते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों में परम्पराओं का संरक्षण होता है।
पाठकों के लिए ज़रूरी जानकारी
- पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे गंगाजल, लाल कपड़ा, खील, मिठाइयाँ और दीपक पहले से तैयार रखें।
- पूजा का समय मुहरत के अनुसार निर्धारित करें; स्थानीय पंचांग या पंडित से सलाह ले सकते हैं।
- यदि पूजा के दौरान कोई असुविधा या सुरक्षा संबंधी समस्या उत्पन्न हो, तो स्थानीय पुलिस (112) या महिला हेल्पलाइन (1091) से संपर्क कर सकते हैं।
- धार्मिक वस्तुओं की खरीदारी के लिए विश्वसनीय स्थानीय दुकानें चुनें, ताकि नकली या असुरक्षित वस्तुओं से बचा जा सके।






