किन्नौर की लोक संस्कृति और परंपराएं सामाजिक पहचान के साथ स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। किन्नौरा समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में 105 पौध प्रजातियों का इस्तेमाल होता है। पूजा-पाठ, देवी-देवताओं के अनुष्ठान, त्योहार, विवाह और अन्य सामाजिक परंपराओं में इनका पीढ़ियों से इस्तेमाल होने के कारण इनके संरक्षण से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी समुदाय में सुरक्षित है। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के हिमालयी वन अनुसंधान संस्थान शिमला की वैज्ञानिक स्वर्ण लता और शिव पाल के अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है।
उनका अध्ययन रोमानिया से प्रकाशित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंजरवेशन साइंस में भी प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने किन्नौरा जनजाति की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में इस्तेमाल होने वाली वनस्पतियों की विविधता, पारंपरिक उपयोग और संरक्षण की स्थिति का अध्ययन किया है। उन्होंने प्राकृतिक रूप से मौजूद पौधों की संख्या का नियमित आकलन करने, मांग और उपलब्धता का अध्ययन करने तथा जरूरत के अनुसार इनके संवर्धन की तकनीक विकसित करने की सिफारिश की है।
अध्ययन में 105 प्रजातियां, 79 वंश और 39 वनस्पति कुल दर्ज किए गए। इनमें 14 पेड़, 17 झाड़ियां, 73 जड़ी-बूटियां और एक लता शामिल है। इनमें 52 प्रजातियां हिमालयी क्षेत्र की मूल प्रजातियां और 15 लगभग स्थानिक हैं। पौधों के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल विभिन्न परंपराओं में होता है। इनमें फूलों का उपयोग सबसे अधिक पाया गया। फूल देवी-देवताओं को अर्पित करने, त्योहारों और सजावट में इस्तेमाल किए जाते हैं। पत्तियां, टहनियां, जड़, फल, तना और बीज भी धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होते हैं।
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