मंडी। फसलों को कीट और रोगों से बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रासायनिक कीटनाशकों के प्रभाव को लेकर सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी के विद्यार्थियों के शोध में महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है। अध्ययन में क्लोरपाइरीफॉस और डाइथेन एम-45 की तुलना नीम के तेल से बने जैव-आधारित कीटनाशक से की गई। शोध के अनुसार रासायनिक कीटनाशकों के मुकाबले नीम तेल आधारित कीटनाशक का कोशिकीय स्तर पर प्रभाव कम पाया गया।
सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी में शोध एवं अनुसंधान को लेकर अलग से डीन रिसर्च कार्यालय कार्यरत है। विश्वविद्यालय के अनुसार शोध एवं विकास गतिविधियों का उद्देश्य नए विचारों, नवाचार और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना है।
छह महीने के अध्ययन में की गई तुलना
शोध कार्य करीब छह महीने की अवधि में किया गया। इसमें अलग-अलग कीटनाशकों के संपर्क में कोशिकाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से कोशिकीय और गुणसूत्रीय स्तर पर होने वाली क्षति को अध्ययन का हिस्सा बनाया।
शोध के निष्कर्षों में क्लोरपाइरीफॉस और डाइथेन एम-45 के संपर्क में अपेक्षाकृत अधिक कोशिकीय तथा गुणसूत्रीय क्षति के संकेत मिले, जबकि नीम तेल आधारित कीटनाशक के मामले में यह प्रभाव कम पाया गया।
खेती में व्यापक रूप से इस्तेमाल होते हैं रासायनिक कीटनाशक
फसलों को कीटों और विभिन्न रोगों से बचाने के लिए किसान अलग-अलग रासायनिक कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। क्लोरपाइरीफॉस कीटनाशक के रूप में और डाइथेन एम-45, जिसमें मैंकोजेब सक्रिय घटक होता है, फफूंद नियंत्रण के लिए कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाता रहा है।
कृषि संबंधी सरकारी साहित्य में भी अलग-अलग फसलों में डाइथेन एम-45 और क्लोरपाइरीफॉस के इस्तेमाल संबंधी सिफारिशें दर्ज हैं।
नीम आधारित विकल्प पर बढ़ता जोर
नीम आधारित कीटनाशकों को कृषि में जैव-आधारित विकल्प के तौर पर देखा जाता है। नीम के तेल में मौजूद प्राकृतिक जैव-सक्रिय घटकों के कारण इसका इस्तेमाल कीट प्रबंधन में किया जाता है।
मंडी विश्वविद्यालय के शोध से सामने आया अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि फसल संरक्षण में रसायनों की प्रभावशीलता के साथ-साथ उनके कोशिकीय प्रभावों पर भी ध्यान देना जरूरी है। हालांकि, किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल फसल, कीट या रोग, मात्रा और कृषि परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक सलाह के आधार पर किया जाना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ अध्ययन
इस अध्ययन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि शोध कार्य को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इससे सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी में जैव-विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों में हो रहे शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर स्थान मिला है।
विश्वविद्यालय की शोध व्यवस्था में विद्यार्थियों को शोध और नवाचार से जोड़ने पर जोर दिया जाता है।
किसानों के लिए क्या मायने?
शोध का मुख्य महत्व यह है कि फसल सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थों का मूल्यांकन केवल उनकी कीट नियंत्रण क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि कोशिकीय और गुणसूत्रीय प्रभावों के आधार पर भी किया जाना चाहिए। नीम तेल आधारित विकल्पों पर इस तरह के और विस्तृत अध्ययन भविष्य में टिकाऊ एवं कम प्रभाव वाले फसल संरक्षण उपायों को समझने में उपयोगी हो सकते हैं।
सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी के विद्यार्थियों का यह शोध हिमाचल में कृषि, जैव-विज्ञान और पर्यावरण-अनुकूल फसल संरक्षण से जुड़े अनुसंधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्ययन के रूप में सामने आया है।

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