हिमाचल में तेजी से बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य और जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही चुनौतियों को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। अमर उजाला शिमला के 26 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस के अवसर पर अमर उजाला कार्यालय शिमला में जलवायु परिवर्तन-पर्यावरण एवं हम विषय पर हुए संवाद में विशेषज्ञों ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत लोगों के जीवन, जंगलों, जल स्रोतों, ग्लेशियरों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जा सकती। रिपोर्ट बता रही हैं कि आपदा का आना तय है, इसके लिए हमें खुद को तैयार करना होगा। व्यक्तिगत प्रयासों से आगे बढ़कर अब सरकारों को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी।





Amar Ujala Samvad: Experts say development should not come at the cost of human lives

टिकेंद्र सिंह पंवर।
– फोटो : अमर उजाला नेटवर्क


ई-व्हीकल और पौधरोपण से आगे बड़े कदम उठाने की जरूरत: टिकेंद्र सिंह पंवर

पर्यावरण विशेषज्ञ एवं शिमला के पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवर ने कहा कि आईपीसीसी-6 की रिपोर्ट के अनुसार आपदा का आना तय है। 1994 के बाद पैदा हुआ हर बच्चा औसतन दो साल में एक आपदा देख रहा है, जो बदलते हालात की गंभीरता को दर्शाता है। लेकिन हम इसके लिए तैयार हैं। इस खतरे के मद्देनजर हमें हर क्षेत्र में कदम उठाने होंगे। संवेदनशील क्षेत्रों को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करना समय की मांग है। लेकिन इसके लिए सरकारों को आगे आना होगा। ई-व्हीकल और पौधरोपण से आगे बढ़कर अब बड़े कदम उठाने की जरूरत है।


Amar Ujala Samvad: Experts say development should not come at the cost of human lives

अधिवक्ता देवेंद्र खन्ना।
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आपस में संवाद करती हैं वनस्पतियां, जहर न छिड़कें: देवेंद्र खन्ना 

पर्यावरण संरक्षण के लिए लड़ रहे अधिवक्ता देवेंद्र खन्ना ने अभयारण्यों और कोर क्षेत्र को डिनोटिफाई करने तथा जंगलों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। पर्यावरणीय आकलन के बिना उद्योगों और बिजली परियोजनाओं को लगाना सही नहीं है। हर्बीसाइड्स के छिड़काव को पूरे वन तंत्र के लिए खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि वनस्पतियां आपस में संवाद करती हैं और एक-दूसरे को पोषक तत्व पहुंचाती हैं। इन पर जहर छिड़कना घातक है।


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पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एसएस रंधावा।
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ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों पर बनीं झीलें खतरा: डॉ. एसएस रंधावा

पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एसएस रंधावा ने कहा कि पिछले तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश में बड़े ग्लेशियरों की संख्या कम हुई है, जबकि उनसे टूटकर बने छोटे ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों पर हजारों झीलें बन गई हैं। इनके टूटने पर प्रदेश में बड़ी तबाही हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से शिमला समेत हिमाचल में बारिश-बर्फबारी का पैटर्न भी बदल रहा है। उन्होंने कहा कि सीमाओं पर सुरक्षा बढ़ाई गई है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच अब हम अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।


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पूर्व आईएएस अधिकारी बीएम नैंटा।
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जड़ी-बूटियों का अवैध दोहन बिगाड़ रहा पारिस्थितिकी: बीएम नैंटा

पूर्व आईएएस अधिकारी और चूड़धार मंदिर कमेटी के अध्यक्ष बीएम नैंटा ने कहा कि बचपन में दिखाई देने वाली कई तितलियां और औषधीय पौधे अब लुप्त हैं। चूड़धार का उदाहरण देते हुए कहा कहा कि यहां एक पर्व पर 8 से 10 हजार लोग पहुंच रहे हैं और जगह-जगह प्लास्टिक की बोतलें फेंकी जा रही हैं। ऐसे तमाम क्षेत्रों में जड़ी-बूटियों का अवैध दोहन भी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने पहाड़ में रोपवे को कनेक्टिविटी का एक पर्यावरण मित्र विकल्प बताया।


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