उत्तर-पश्चिमी हिमालय में 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वातावरण को ठंडा रखने में मदद करने वाले सल्फेट एरोसोल में लगातार कमी आई है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में सतह के नजदीक तापमान बढ़ने का रुझान सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल एटमॉस्फेरिक पॉल्यूशन रिसर्च के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित अध्ययन में 1980 से 2023 तक के 43 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को शामिल किया गया। यह अध्ययन आईआईटी मंडी के शोधार्थियों ने किया है।
अध्ययन के मुताबिक, 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फेट एरोसोल की मात्रा में हर साल औसतन 0.0002 एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (एओडी) की कमी आई। इसी अवधि में सतह के नजदीक तापमान में औसतन 0.0127 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अध्ययनकर्ताओं ने सल्फेट एरोसोल में कमी और तापमान बढ़ने के बीच सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण संबंध पाया है। सल्फेट एरोसोल सूर्य की किरणों को बिखेरकर वातावरण को ठंडा करने में भूमिका निभाते हैं। ये बादलों में जल कण बनने में भी मदद करते हैं, जिससे बादलों की परावर्तन क्षमता बढ़ सकती है। ऐसे में इन कणों में कमी आने से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ठंडक देने वाला प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
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