हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 1972 में ब्यास सतलुज लिंक परियोजना के लिए अधिग्रहीत की गई भूमि को वापस लौटाने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत यदि भूमि एक बार सभी बंधनों से मुक्त होकर राज्य में निहित हो जाती है, तो इसे मूल मालिकों को वापस नहीं सौंपा जा सकता, भले ही इसका उपयोग उस उद्देश्य के लिए न किया गया हो, जिसके लिए इसे अधिग्रहीत किया गया था। मुआवजा प्राप्त करने के बाद मूल मालिक कानून की नजर में अधिकार रहित व्यक्ति बन जाता है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने माना कि 24 मई 2001 का सरकारी पत्र सभी अधिशेष अधिग्रहित भूमियों को वापस करने के लिए कोई सामान्य नीति निर्देश नहीं था।


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