पहाड़ों के जंगलों में उगने वाले पौधे सदियों से लोगों की दवा, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों का सहारा रहे हैं, लेकिन यही जरूरत पौधों की जड़ें और पूरा पौधा निकालने तक पहुंच गई है जो आने वाले समय में इस हरे खजाने को खत्म कर सकती है। भारतीय हिमालय की उपयोगी वनस्पतियों पर हुए अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की 555 ऐसी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनका स्थानीय स्तर पर पारंपरिक, औषधीय या अन्य उपयोग होता है। अध्ययन के अनुसार 51.3 फीसदी उपयोगी प्रजातियों में पौधे के कम से कम एक हिस्से को उसके प्राकृतिक स्थान से निकालने या तोड़ने से नुकसान का खतरा है। इनमें जड़ या पूरा पौधा निकालना खासतौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पौधे के दोबारा विकसित होने की क्षमता प्रभावित हो रही है। यानी जिस पौधे से लोग अपनी जरूरत पूरी कर रहे हैं, उसके इस्तेमाल का तरीका ही इनके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर रहा है। भारतीय हिमालय में पौधों, कवक, लाइकेन और शैवाल की कुल 5,404 उपयोगी प्रजातियां दर्ज हैं। इनमें 96.4 फीसदी प्रजातियों का औषधीय इस्तेमाल हो रहा है। करीब 49 फीसदी प्रजातियों का उपयोग भोजन के लिए और 36.6 फीसदी का इस्तेमाल अन्य सामग्री के रूप में किया जाता है।
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