हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवासों के आवंटन के नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि हर साल नए सिरे से सूची तैयार करने का नियम पूरी तरह तर्कहीन है और यह व्यवस्था सिर्फ फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट बनकर रह गई है। कोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग को इस नियम का पुनरावलोकन करने के निर्देश दिए। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने यह आदेश अमित कुमार ठाकुर की ओर से दायर याचिका पर दिए। कोर्ट ने सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव की ओर से दाखिल हलफनामे को देखने के बाद हिमाचल प्रदेश सरकारी आवास आवंटन (सामान्य पूल) नियम, 1994 के नियम 6 के पीछे के तर्क पर हैरानी जताई। इस नियम के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों को आवास के लिए हर साल दोबारा आवेदन करना पड़ता है।
अदालत ने कहा कि हर साल नई लिस्ट बनाना समझ से परे है। इसकी जगह विभाग को एक प्रमुख स्थाई सूची रखनी चाहिए। इस व्यवस्था में आवास मिलने वाले व्यक्ति का नाम सूची से हटा दिया जाए। रिटायरमेंट या ट्रांसफर के कारण अपात्र हुए लोगों के नाम भी हटा दिए जाएं। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि यदि याचिकाकर्ता अमित कुमार ठाकुर सेवा की अनिवार्यता के आधार पर आउट ऑफ टर्न आवास पाने के हकदार हैं, तो उन्हें मकान देने में क्या अड़चन है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि लोक सेवा आयोग के ही एक कर्मचारी को पहले 15 अक्तूबर 2023 और फिर दोबारा 22 मई 2025 को सरकारी मकान आवंटित किया गया। कोर्ट ने सरकार से इस पर भी स्पष्टीकरण मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को होगी।
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