हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ और कम उम्र का पति अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हट सकता कि वह सेना से रिटायर हो चुका है। अदालत ने भारतीय नौसेना से रिटायर 34 साल के पति की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने साफ कहा कि पति को अपनी पत्नी और सात साल के बेटे को दस-दस रुपये (कुल बीस हजार रुपये प्रति माह) का गुजारा भत्ता देना ही होगा, और यह रकम केस दर्ज करवाने की तारीख पांच सितंबर 2019 से लागू होगी। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की अदालत ने ऊना फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पति का कहना था कि गुजारा भत्ता कोर्ट का फैसला आने की तारीख से मिलना चाहिए, न कि 2019 से जब केस दर्ज हुआ था। हाईकोर्ट ने दलील को खारिज करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता केस दर्ज कराने की तारीख से ही लागू होता है, ताकि बेसहारा पत्नी और बच्चे को अदालत की देरी का नुकसान न उठाना पड़े। पति ने दलील दी कि वह नौसेना से रिटायर हो चुका है और उस पर बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि पति की उम्र अभी केवल 34 साल है, वह पूरी तरह स्वस्थ है और उसे पेंशन के साथ रिटायरमेंट के वित्तीय लाभ भी मिले हैं। इसलिए वह अपनी पत्नी और मासूम बच्चे का खर्चा उठाने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
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