हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के वरिष्ठ लैब तकनीशियनों को पंजाब राज्य के समान संशोधित वेतनमान देने से मना कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी सरकार किसी दूसरे राज्य के वेतनमान या नियमों को अपनाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल जज के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि वेतनमान का निर्धारण करना एक नीतिगत निर्णय होता है। इसमें भर्ती का तरीका, योग्यता, पदोन्नति के अवसर, कर्तव्यों की प्रकृति और नियोक्ता (सरकार) की भुगतान करने की क्षमता जैसे कई कारक शामिल होते हैं।
अदालत ने हाल ही में सहकारी विभाग के निरीक्षकों से जुड़े एक अन्य समान मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि कानूनन एक राज्य दूसरे राज्य की ओर से तय किए गए वेतनमानों को मानने के लिए विवश नहीं है। खंडपीठ ने इस संबंध में दायर अपील को खारिज कर दिया। यह अपील 53 कर्मचारियों की ओर से एकल जज के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसने उनकी इस मांग को पहले ही नामंजूर कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उन्हें पंजाब राज्य के वरिष्ठ लैब तकनीशियनों की तर्ज पर 1978 से संशोधित वेतनमान दिया जाए।
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