बगीचों में पेड़ों की पत्तियां, जड़ें और दूसरे जैविक पदार्थ केवल पौधों के पोषण में ही योगदान नहीं देते, बल्कि मिट्टी में कार्बन जमा करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में मिट्टी में कार्बन संचय के मामले में खुबानी और अखरोट के बगीचे सेब से आगे रहे हैं। शोध के अनुसार, खुबानी के बगीचों में मिट्टी के भीतर कार्बन जमा होने की दर सबसे अधिक 0.54 मेगाग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष रही। वहीं, अखरोट में यह दर 0.53 और सेब के बगीचों में 0.37 मेगाग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष दर्ज की गई।
ये निष्कर्ष पश्चिमी हिमालय के बागवानी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इससे संकेत मिलता है कि स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल फलदार पेड़ों का चयन करके मिट्टी में जैविक कार्बन के संचय को बढ़ावा दिया जा सकता है। हालांकि, बागवानी में किसी दूसरे फलदार पेड़ को अपनाने का फैसला स्थानीय परिस्थितियों, उत्पादन और किसानों की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर करना होगा।
22 साल से पुराने बगीचों की मिट्टी का अध्ययन
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में सात तरह के शीतोष्ण फलदार बगीचों की मिट्टी का अध्ययन किया। इसमें 22 साल से अधिक पुराने बगीचों की मिट्टी का विश्लेषण किया गया। शोध के निष्कर्ष पश्चिमी हिमालय के दूसरे बागवानी क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।
अध्ययन में मिट्टी की सतह से 20 सेंटीमीटर की गहराई तक कार्बन संचय का आकलन किया गया। इस स्तर पर खुबानी और अखरोट के बगीचों में कार्बन संचय की दर सबसे अधिक मिली। सेब के बगीचों में भी मिट्टी की गुणवत्ता से जुड़े कई संकेतक बेहतर पाए गए, लेकिन कार्बन जमा होने की दर के मामले में वे खुबानी और अखरोट से पीछे रहे।
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