
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा(फाइल)।
– फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा(फाइल)।
– फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
आधुनिक दाैर में टनल और फ्लाईओवर से होकर भले ही इंसान का सफर आसान हो गया हो, लेकिन कुल्लू के देवी-देवताओं की राह आज भी परंपराओं से तय होती है। देवी-देवता न तो टनल से गुजरते हैं और न ही फ्लाईओवर के नीचे से आवाजाही करते हैं। इसे कुल्लवी भाषा में लंघा कहते हैं। मान्यता है कि देवी-देवताओं का स्थान भगवान के दर्जे का है। सर्वोपरि स्थान होने के कारण ही देवी-देवता लंघा से नहीं गुजरते हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में भाग लेने के लिए कुछ देवी-देवता करीब 150 से 200 किलोमीटर दूरी से आते हैं। इस दौरान यात्रा पैदल ही रहती है। दशहरा उत्सव में विशेष महत्व रखने वाले बिजली महादेव मंदिर कमेटी के कोषाध्यक्ष फतेह सिंह राणा कहते हैं कि देवता लंघा पार नहीं करते हैं। घर की दहलीज तो दूर, घर की छत से टपकने वाले पानी की धार तक को पार नहीं करते। देव परंपराओं में इस मर्यादा का आज भी पूरी श्रद्धा से पालन किया जाता है।
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