कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद हिमाचल प्रदेश अब देश के लिए साक्षरता का आदर्श मॉडल बनकर उभर रहा है। वर्ष 1951 में प्रदेश की साक्षरता दर महज 7.98 फीसदी थी, वहीं आज हिमाचल लगभग पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य तक पहुंच चुका है। 75.28 लाख की आबादी वाले प्रदेश में अब केवल 28,480 लोग ही निरक्षर शेष बचे हैं। 99.7 फीसदी साक्षरता दर के साथ गोवा का देश में पहला स्थान है,जबकि 99.5 फीसदी के साथ हिमाचल दूसरे नंबर पर है।
केंद्र सरकार के उल्लास कार्यक्रम के तहत चलाए गए विशेष अभियान ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। शिक्षा विभाग, स्वयंसेवी शिक्षकों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयासों से हजारों लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया गया है। प्रदेश में वर्ष 2023-24 के दौरान किए गए सर्वेक्षण में 94,930 निरक्षर व्यक्तियों की पहचान की गई थी। इसके बाद सितंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच तीन चरणों में फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी असेसमेंट टेस्ट आयोजित किए गए। इन परीक्षाओं के माध्यम से यह आकलन किया गया कि शिक्षार्थियों ने पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणना करना सीखा है या नहीं।
लगातार प्रशिक्षण और मूल्यांकन के परिणामस्वरूप दो वर्षों के भीतर 66 हजार से अधिक लोग साक्षरता की श्रेणी में शामिल हुए। अब प्रदेश में निरक्षरों की संख्या घटकर केवल 28,480 रह गई है। हिमाचल का साक्षरता अभियान केवल पढ़ना-लिखना सिखाने तक सीमित नहीं रहा। बदलते समय की जरूरतों को देखते हुए शिक्षार्थियों को डिजिटल भुगतान, मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग और ऑनलाइन सेवाओं की जानकारी भी दी गई।
उल्लास कार्यक्रम के राज्य नोडल अधिकारी वीरेंद्र चौहान ने कहा कि प्रदेश में स्कूलों का व्यापक नेटवर्क, बेटियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान, सामाजिक जागरूकता और समुदाय आधारित भागीदारी ने साक्षरता को जन आंदोलन का रूप दिया। साक्षरता अभियान में महिलाओं की भागीदारी अधिक रही। स्वयं सहायता समूहों, आंगनबाड़ी केंद्रों और पंचायत स्तर पर चलाए गए कार्यक्रमों के माध्यम से हजारों महिलाओं ने अक्षर ज्ञान प्राप्त किया।
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