कुल्लू दशहरा उत्सव ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं। बुजुर्गों के अनुसार, पहले देव समाज के लोग घर से राशन और बिस्तर लेकर आते थे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाते थे। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन देव संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और नाटी के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता भी बढ़ी है। पढ़ें विस्तार से…

बुजुर्गों की जुबानी, पुराने कुल्लू दशहरे की कहानी।
– फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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