कुल्लू दशहरा उत्सव ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं। बुजुर्गों के अनुसार, पहले देव समाज के लोग घर से राशन और बिस्तर लेकर आते थे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाते थे। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन देव संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और नाटी के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता भी बढ़ी है। पढ़ें विस्तार से…

Kullu Dussehra Old Traditions According to Elders

बुजुर्गों की जुबानी, पुराने कुल्लू दशहरे की कहानी।
– फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

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ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में चलने वाला कुल्लू का दशहरा उत्सव यूं ही अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा….इस सफर में उत्सव ने कई उतार चढ़ाव और बदलाव देखे हैं। कुल्लू दशहरा उत्सव में पहुंचे 70 से 80 वर्ष तक के बुजुर्गों का कहना है कि उत्सव में कई अच्छे बदलाव भी आए हैं और कई बदलाव हमारी संस्कृति के लिए ठीक नहीं है इस पर ध्यान देने की जरूरत है।





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