हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एएनएम (सहायक नर्स मिडवाइफ) के पद पर सीधी भर्ती के बाद पदोन्नति के तहत वेतन वृद्धि और पुरानी दाई सेवा को जोड़कर एसीपीएस (एश्योर्ड कॅरिअर प्रोग्रेशन स्कीम) के लाभ की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश रंजन शर्मा की अदालत ने कहा कि जब किसी कर्मचारी ने बिना किसी विरोध के सीधी भर्ती के जरिये नए सिरे से नियुक्ति स्वीकार कर ली है, तो वह बाद में पुरानी सेवा को जोड़ने या स्वतः पदोन्नति के लाभ का दावा नहीं कर सकता।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 2000 में बिना किसी विरोध या आपत्ति के नए सिरे से एएनएम के पद पर नियुक्ति स्वीकार की थी। इसके 18 साल बाद (2016 में) अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। अदालत ने कहा कि अत्यधिक देरी के कारण याचिकाकर्ता की ओर से पेश तर्कों को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया तथा प्रतिवादियों की ओर से जारी 20 अक्तूबर 2004 के अस्वीकृति आदेश को सही ठहराया। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता लीला देवी 7 नवंबर 1986 को स्वास्थ्य/आयुष विभाग में नियमित आधार पर दाई/मिडवाइफ के पद पर तैनात हुई थी।
वर्ष 1996 में विभाग से सशर्त अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त कर उन्होंने एएनएम का प्रशिक्षण लिया। एनओसी में स्पष्ट शर्त थी कि प्रशिक्षण के बाद उच्च पद या उच्च वेतनमान का कोई स्वतः दावा नहीं होगा। वर्ष 2000 में विभाग की ओर से निकाली गई भर्ती प्रक्रिया में भाग लेकर याचिकाकर्ता 19 जुलाई 2000 को सीधी भर्ती के माध्यम से एएनएम के पद पर नियुक्त हुई।
याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनकी 2000 में हुई एएनएम नियुक्ति को सीधी भर्ती के बजाय पदोन्नति माना जाए, इंक्रीमेंट दिया जाए और दाई के रूप में की गई पुरानी सेवा (1986-2000) को जोड़कर 4-9-14 वर्ष की एसीपीएस का लाभ दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत दाई का प्रशिक्षण पूरा करने पर उसे स्वतः एएनएम के पद पर पदोन्नत किया जाए। अदालत ने कहा कि एश्योर्ड कॅरिअर प्रोग्रेशन स्कीम 1998 के तहत केवल एक ही कैडर या समान पद की सेवा अवधि को जोड़ा जा सकता है। दाई और एएनएम दो अलग-अलग पद हैं।
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