हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के अधिसूचित वन्यजीव अभयारण्यों और आर्द्रभूमि (वेटलैंड) क्षेत्रों में हो रही अवैध खेती, बाड़बंदी और कब्जों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु की खंडपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उपायुक्त कांगड़ा की स्टेटस रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को अधिक स्पष्ट हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। अगली सुनवाई 29 अक्तूबर को होगी। सुनवाई के दौरान डीसी कांगड़ा की ओर से एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई थी।

इसमें कहा गया था कि वन्यजीव अभयारण्यों और वेटलैंड क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों, अस्थायी निर्माणों और कब्जों की पहचान करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर दिए गए हैं। साथ ही सरकारी भूमि के सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड के सत्यापन के लिए राजस्व अधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं।हालांकि, अदालत ने पाया कि इस हलफनामे में उन पत्रों या निर्देशों की प्रतियां संलग्न नहीं की गई थीं और न ही यह बताया गया था कि ये निर्देश किस तारीख को व किन अधिकारियों को भेजे गए।

अदालत ने यह भी पाया कि भले ही डीसी व्यक्तिगत रूप से इसकी निगरानी करने की बात कह रहे हैं, लेकिन संबंधित प्राधिकरण को कोई लिखित संचार नहीं भेजा गया था। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने के कारण जिन लोगों पर जुर्माना लगाया गया था या जिनसे मुआवजा वसूला जाना था, उनका कोई भी विवरण हलफनामे में नहीं दिया गया था। अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया कि पिछले आदेशों के बावजूद वन विभाग का हलफनामा और उपायुक्त सिरमौर की स्टेटस रिपोर्ट अभी तक आनी बाकी है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को अगली सुनवाई से पहले अपनी-अपनी रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए हैं।

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