हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने और बढ़ते तापमान का असर अब हिमनदीय झीलों पर साफ दिखाई देने लगा है। पिछले दस साल में हिमाचल में 710 नई हिमनदीय झीलें बन गई हैं। आईआईटी मंडी के अध्ययन में वर्ष 2025 तक 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कुल 2,076 हिमनदीय झीलों का मानचित्रण किया गया है। वर्ष 2015 की तुलना में इन झीलों की संख्या में करीब 52 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, इनका कुल क्षेत्रफल भी एक दशक में 28.45 फीसदी बढ़ गया है।


सबसे बड़ी चिंता इन झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) को लेकर है। अध्ययन में नौ झीलों को बहुत अधिक खतरे वाली श्रेणी में रखा गया है, जबकि 435 झीलें उच्च संवेदनशीलता वाली पाई गई हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में इन झीलों की निगरानी और समय रहते सुरक्षा उपायों की जरूरत बढ़ गई है। नौ झीलों को बहुत अधिक खतरे वाली श्रेणी में रखा गया। इसके अलावा 435 झीलें उच्च संवेदनशीलता वाली पाई गईं। 

शोधकर्ताओं ने काशंग, गेपनग गाथ, कालीकुंड और समुद्रतापू जैसी झीलों को सबसे अधिक संवेदनशील झीलों में शामिल किया है। किसी झील के खतरनाक होने का आकलन केवल उसके आकार या उसमें मौजूद पानी की मात्रा के आधार पर नहीं किया गया। आईआईटी मंडी के प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने कहा कि प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारण हिमनदों में बदलाव के लिए जिम्मेदार हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटकों की आमद भी असर डाल रही है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से धूल का जमाव बढ़ता है। ग्लेशियर पर जमा धूल सूर्य की गर्मी को अधिक सोखती है, जिससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है।

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